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Thursday, July 18, 2024
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पहले चुनाव का सबसे चर्चित किस्सा… जब अपने ही पीए से हार गए थे डॉ. बीआर आंबेडकर | How BR Ambedkar defeated by his PA Narayan Sadoba Kajrolkar from the Mumbai North Central constituency in first lok sabha election 1952


पहले चुनाव का सबसे चर्चित किस्सा... जब अपने ही पीए से हार गए थे डॉ. बीआर आंबेडकर

पहले लोकसभा चुनाव बाबा साहब को उन्हीं के पीए नारायण काजरोलकर ने हराया था.

देश की आजादी के बाद भारत रत्न बाबा साहब डाॅ. भीमराव आंबेडकर की अगुवाई में बना संविधान 26 नवंबर, 1949 को अंगीकार किया गया था और 26 जनवरी 1950 को इसे लागू किया गया. तभी से भारत एक गणतांत्रिक देश बना. यह संविधान लागू होने के बाद साल 1951-1952 में देश में पहला लोकसभा चुनाव हुआ. इसमें बाबा साहब बुरी तरह से हार गए थे. बाबा साहब को उन्हीं के पीए नारायण काजरोलकर ने हराया था और उनकी यह चुनावी हार लंबे समय तक चर्चा में रही थी.

बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर को मरणोपरांत 31 मार्च 1990 को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया था. इसी बहाने आइए जान लेते हैं बाबा साहब की चुनावी हार का वह किस्सा.

मतभेद के कारण कांग्रेस से दे दिया था इस्तीफा

दरअसल, आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू की अगुवाई में देश में बनी पहली अंतरिम सरकार में बाबा साहब विधि और न्यायमंत्री बनाए गए थे. उनके नेतृत्व में बना संविधान लागू हो चुका है. हालांकि, बाद में कई मुद्दों पर उनका कांग्रेस से नीतिगत मतभेद हो गया. इसके कारण उन्होंने 27 सितंबर 1951 को पंडित जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र लिखकर मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद साल 1942 में खुद के गठित शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन यानी अनुसूचित जाति संघ को नए सिरे से मजबूत करने में लग गए. इस संगठन को स्वतंत्रता संघर्ष की व्यस्तताओं के कारण वह ठीक से खड़ा नहीं कर पाए थे.

आम चुनाव में खुद के बनाए संगठन से मैदान में उतरे

इसी बीच, आम चुनाव की घोषणा हो गई जिसके लिए मतदान 1951 से लेकर 1952 तक हुए. डॉ. भीमराव आंबेडकर ने पहले आम चुनाव में शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन के बैनर के तले लोकसभा चुनाव में 35 प्रत्याशी खड़े किए. इसमें उनके दो ही प्रत्याशी जीत हासिल कर सके. इस चुनाव में डॉ. भीमराव आंबेडकर खुद भी लड़े पर जब नतीजे आए तो काफी चौंकाने वाले थे. वह चुनाव हार गए थे.

यह वह दौर था जब डॉ. भीमराव आंबेडकर की पहचान देश भर में अनुसूचित जातियों के लिए काम करने वाले कद्दावर नेता के रूप में थी. डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने उत्तरी मुंबई सीट से चुनाव लड़ने का मन बनाया तो कांग्रेस ने उनके मुकाबले में उन्हीं के पीए नारायण एस काजरोलकर को मैदान में उतार दिया था. वह भी पिछड़े वर्ग से थे. इसके अलावा इस सीट से कम्युनिस्ट पार्टी और हिंदू महासभा ने भी अपना-अपना प्रत्याशी खड़ा किया था.

दूध का कारोबार करने वाले काजरोलकर राजनीति में नौसिखिए थे

नारायण काजरोलकर दूध का कारोबार करते थे और राजनीति में वह नौसिखिए नेता थे. इसके बावजूद पंडित जवाहर लाल नेहरू की लहर पहले चुनाव में इतनी तगड़ी थी कि नारायण काजरोलकर जीत गए थे. इस चुनाव में डॉ. भीमराव आंबेडकर को 1,23,576 वोट मिले थे और वह चौथे स्थान पर थे. वहीं, 1,37,950 वोट पाकर काजरोलकर चुनाव जीते थे. इसके बाद साल 1954 में बंडारा लोकसभा के लिए उप चुनाव हुआ था. इसमें भी डॉ. भीमराव आबंडेकर खड़े हुए पर एक बार फिर उन्हें कांग्रेस से हार का समाना करना पड़ा था.

इसलिए डॉ. आंबेडकर को करना पड़ा था हार का सामना

वास्तव में पहले आम चुनाव के वक्त देश में कांग्रेस की जबरदस्त लहर थी. देश नया-नया आजाद हुआ था और पंडित जवाहरलाल नेहरू जनता की नजरों में हीरो थे. कहा जाता है कि तब अगर पंडित नेहरू के नाम पर बिजली के खंभे को भी चुनाव में खड़ा कर दिया जाता तो वह भी जीत जाता. ऐसा ही कुछ वास्तव में हुआ जब पहले लोकसभा चुनाव के लिए मतगणना के बाद नतीजा आया. कांग्रेस को बड़ी आसानी से स्पष्ट बहुमत हासिल हुआ.

कांग्रेस को पहले चुनाव में लोकसभा की 489 में से 364 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. इसी तरह से पूरे देश में 3280 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव हुए थे, जिनमें से उसे 2247 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. तब पूरे संसदीय चुनाव के दौरान कांग्रेस को कुल मतदाताओं की संख्या का 45 फीसदी वोट मिला था. इसकी जीती सीटें कुल सीटों का करीब 74.4 फीसदी थीं. वहीं, राज्य विधानसभाओं के लिए हुए पड़े कुल वोटों में से उसे 42.4 फीसदी मत हासिल हुए थे. तब विधानसभाओं की 68.6 फीसदी सीटों पर कांग्रेस ने कब्जा जमाया था. हालांकि आश्चर्यजनक रूप से उस माहौल में भी कांग्रेस के 28 मंत्री चुनाव हार गए थे.

15 साल की उम्र में हो गई थी शादी

डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म अप्रैल 1891 में महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में हुआ था. महार (दलित) जाति में जन्मे डॉ. आंबेडकर को बचपन से ही छुआछूत का सामना करना पड़ा था. अप्रैल 1906 में केवल 15 साल की उम्र में उनकी शादी नौ साल की रमाबाई से कर दी थी, जिन्होंने आगे की पढ़ाई में उनका साथ दिया. इससे डॉ. आंबेडकर एक न्यायविद, अर्थशास्त्री, समाज सुधारक और राजनेता के रूप में दुनिया के सामने आए.

मृत्यु से पहले अपना लिया था बौद्ध धर्म

उन्होंने देश की आजादी के बाद संविधान सभा में संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति की अगुवाई की. डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म पर एक किताब लिखी थी, जिसका नाम है बुद्ध और उनका धर्म. हालांकि इस किताब का प्रकाशन उनकी मृत्यु के बाद हुआ था. वैसे यह किताब लिखने के बाद बाबा साहब ने 14 अक्तूबर 1956 को खुद बौद्ध धर्म अपना लिया था. इसके कुछ ही दिन बाद छह दिसंबर 1956 को उनका निधन हो गया था. साल 1990 में उन्हें मरणोपरांत सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया था.

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