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Wednesday, July 17, 2024
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Itikaf In Ramadan: रमजान के आखिरी 10 दिनों में मस्जिद से बाहर क्यों नहीं निकलते कुछ लोग? | Eftkaf in ramadan itikaf kya hota hai in hindi muslim itikaf kyu karte hai


Itikaf In Ramadan: रमजान के आखिरी 10 दिनों में मस्जिद से बाहर क्यों नहीं निकलते कुछ लोग?

नमाज पढ़ता हुआ मुसलमान

Itikaf Kya hota Hai: रमजान के महीने में मुसलमान नमाज और रोजे रखकर अल्लाह से सलामती और रहमत की दुआएं मांगते हैं. ‘एतकाफ’ रमजान महीने के नफ्ली यानी स्वेच्छिक इबादतों में से एक होता है. इसमें मुसलमान दुनियादारी को छोड़कर दस दिनों के लिए पूरी तरह इबादत में मशरूफ हो जाते हैं. 20वें रोजे को मगरिब की नमाज के बाद एतकाफ करने वाला शख्स घर के किसी कोने, खाली कमरे या फिर मस्जिद में दस दिन सिर्फ इबादत में गुजारता है. इन दस दिनों के दौरान वो अगर घर में होते हैं तो घर से बाहर नहीं निकलते, मस्जिद में होते हैं तो मस्जिद से बाहर नहीं निकलते. कुल मिलाकर दुनिया के कामकाज से खुद को अलग कर लेते हैं और एकांतवास में चले जाते हैं. अपने आसपास मौजूद लोगों से बातें भी बस बहुत जरूरी करते हैं.

एतकाफ क्या है?

इस्लाम में इबादत के जो तरीके बताए गए हैं उनमें से कुछ तरीके खास माने जाते हैं उन्हीं में से एक एतकाफ भी है. ये रमजान की इबादतों में से एक अहम इबादत है, ये एक ऐसी सुन्नत है जिसको पैगंबर भी करते हुए आए थे. अरबी भाषा में एतकाफ का मतलब है किसी चीज का पालन करना या उसके लिए प्रतिबद्ध होना. एतकाफ का मतलब मस्जिद या घर में अलग रहकर अपना समय पूरी तरह से अल्लाह की इबादत में समर्पित करना है.

दारुल कुरआन गाजियाबाद के मुफ्ती सलाउद्दीन कासमी साहब ने बताया कि इस्लाम में एतकाफ सुन्नत ए मुवक्किदा है. पैगंबर मुहम्मद साहब पाबंदी के साथ एतकाफ करते थे. वैसे तो पूरे साल के किसी भी महीने में एतकाफ किया जा सकता है लेकिन रमजान के तीसरे अशरे यानी आखिर के 10 दिन में पाबंदी के साथ इसे करना बेहतर माना गया है. यह एतकाफ हर मोहल्ले के कम से कम एक आदमी का करना सुन्नत है. अगर मोहल्ले की मस्जिद में एक आदमी भी एतकाफ कर लेता है, तो सभी के ऊपर से एतकाफ की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है.

इस्लाम में एतकाफ की बहुत बड़ी फजीलत आई है. अल्लाह के नबी सलल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जब कोई मुसलमान एतकाफ करता है, तो वो बंदा बहुत सारे गुनाहों से बच जाता है. इसके अलावा एतकाफ का दूसरा फायदा ये है कि बहुत सारे ऐसे अमल हैं जो एतकाफ की हालत में मुसलमान नहीं कर सकता, उसके बावजूद भी उन अमल को करने का सवाब उसे मिलता है.

कहां किया जाता है एतकाफ?

मर्द घर पर एतकाफ नहीं कर सकते हैं, वो मस्जिदों में करते हैं. मस्जिद में किसी एक कोने में वो पर्दा लगाकर रहते हैं, सिर्फ नमाज के वक्त बाहर आते हैं. इस दौरान वो किसी दूसरे नमाजी से बात भी नहीं करते. बहुत ही जरूरी हो तो कोई बात करते हैं. इस दौरान वो मस्जिद के दहलीज से बाहर कदम नहीं रखते हैं.

वहीं, औरतें घरों में ही एतकाफ करती हैं. इसके लिए घर में एक कमरा मुकर्रर कर लिया जाता है और फिर पूरे 10 दिन घर से बिना कहीं बाहर निकले एतकाफ मुकम्मल किया जाता है.

कितने दिन तक और कब किया जाता है एतकाफ

दारुल कुरआन गाजियाबाद के मुफ्ती सलाउद्दीन कासमी साहब ने कहा कि वैसे तो किसी भी महीने में एतकाफ किया जा सकता है लेकिन रमजान का आखिरी अशरा यानी आखिरी 10 दिन का एतकाफ करना सुन्नत है. वैसे तो कोई मुसलमान 1 घंटे, 1 दिन या 2 दिन का एतकाफ भी कर सकता है. लेकिन ये एतकाफ नफली एतकाफ में गिना जाएगा. जबकि सन्नत-ए-मुवक्कदा एतकाफ रमजान मुबारक के आखिरी 10 दिन में किया जाता है. एतकाफ में कोई भी मुसलमान बैठ सकता है चाहे वो बच्चा हो, जवान हो या बूढ़ा हो. हालांकि अगर कोई बच्चा एतकाफ करना चाहता है तो उसकी उम्र 14 से ऊपर हो यानी वो बालिग हो.

एतकाफ कब खराब हो जाता है?

एतकाफ के बहुत सारे नियम हैं. अगर एतकाफ में बैठा हुआ कोई मुसलमान बगैर किसी जरूरत के मस्जिद से बाहर निकल जाए तो उसका एतकाफ मकरूह हो जाता है. हालांकि मस्जिद में रहकर ही बाथरूम जाने से एतकाफ खराब नहीं होता है.

एतकाफ कितनी तरह का होता है?

सुन्नत एतकाफ- रमजान के आखिरी दस दिनों के दौरान किए जाने वाले एतकाफ को सुन्नत माना जाता है क्योंकि पैगंबर मुहम्मद ने रमजान के आखिरी दस दिनों में एतकाफ किया था.

नफ्ली एतकाफ- एतकाफ साल के किसी भी दिन या रात को किया जा सकता है. इसे नफ्ल यानी स्वैच्छिक कार्य माना जाता है.

वाजिब एतकाफ- अगर एतकाफ करने का इरादा है तो एतकाफ करना वाजिब है. यह अल्लाह के प्रति मन्नत मानना हो सकता है, जैसे कि किसी नियत यानी इरादे से एतकाफ करना या फिर किसी मन्नत पूरी कराने के लिए एतकाफ करना. इसका मतलब यह कहना या सोचना है कि अगर ऐसा होता है, तो मैं इतने दिनों के लिए एतकाफ करूंगा.

एतकाफ से क्या मिलता है?

पैगंबर मुहम्मद ने फरमाया जो शख्स रमजान में 10 रोज का एतकाफ करे उसको दो हज और दो उमराह जैसा सवाब होगा. इसके अलावा एतकाफ करने वाला उन तमाम गुनाहों से रुका रहता है और उसको सवाब ऐसा मिलता है जैसे वो कोई तमाम नेकियां कर रहा हो. जब तक इंसान एतकाफ की हालत में होता है तो उसका एक-एक मिनट एक एक लम्हा इबादत में लिखा जाता है, उसका सोना उसका खाना-पीना और उसका उठना बैठना सब इबादत में शामिल होता है.

कैसे करते हैं एतकाफ?

एतकाफ में रमजान के आखिरी दस दिनों में इंसान अपने तमाम दुनिया के काम को छोड़कर अल्लाह तआला के घर यानी मस्जिद में जा पड़ता है और हर किसी से अलग होकर पूरी तवज्जो के साथ अल्लाह के साथ अपना ताल्लुक बना लेता है और यह इरादा करके मस्जिद में इबादत करता रहता है कि इतने दिन तक बगैर किसी मजबूरी के यहां से नहीं निकलूंगा. ईद का चांद दिखने पर ही ये एतकाफ करने वाला शख्स मस्जिद या अपने कमरे से बाहर निकलता/निकलती है.



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